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माँ


नुमाइश ए जग न होता प्यार माँ का ।

सभी को मुकम्मल न होता प्यार माँ का ।

उसने तो दी माँ को जिल्लत भरी जिन्दगी ,

जिसकी पैदाईश मे लग गया कतरा - कतरा माँ का।

— बाबू प्रेम अमर
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