हे बीज सृजन का बोने वाले

तुमको समर्पित है ये फूल ,

मिली आजादी जिस चिंगारी से

जाए हम फिर कैसे भूल ?


जन्म ज्योति से हुआ उजाला

जिनके धरा के आने मे ,

पंचतत्व के वो अंगारे

धधक रहे हैं सीने में


आप यहीं हो यही कहीं हो

बस ओझल हो इन नयनो से ,

अक्स तुम्हारा खून मे शामिल

झलकता जो बीर जवानों से ।

       

 बाबू प्रेम अमर