खुद को ज़हर के कर हवाले , जो हमें अमरत्व देकर।
खुद के लिए फांसी चुने जो , हमको आजादी हाथ देकर ।
चमचमाते सूर्य को भी , देखता जो नेत्र खोले
माँ का बेटा है जो करता , कर्ज चुकता प्राण देकर।
मस्तक हमारा उठ सके तो , अपना मस्तक काट देता
वीरता का है मशीहा , दुश्मनों को मात देता।
शत् शत् नमन उनकी जवानी , धरणी रक्त से सींच देता ।
ललकारो फिर भारत मे , बीत गए अब बरस पचहत्तर
माँ का बेटा है जो करता , कर्ज चुकता प्राण देकर ।
<~ बाबू प्रेम अमर

