ज़िंदगी और मौत के बीच
ज़िंदगी के लम्हों की सौगात खत्म होती जाएगी
ज़िंदगी इक दिन मौत को गले लगाएगी
जाने क्यों इक हूक उठती है मन में
क्या मौत ही इस ज़िंदगी की मंजिल बन जाएगी?
हां… यह सच है मौत ज़िंदगी की किताब का आखिरी पन्ना है
पर इस आखिरी पन्ने से पहले ज़िंदगी की किताब लिखी जानी बाकी है
और बाकी है…. अनुभवों की स्याही से इसे रंगना
बहुत से पन्ने उलझन- कशमकश
सफलताओं-विफलताओं की स्याही में रंग चुके हैं
अतृप्त तृष्णाओं के बोझ से
फड़फड़ाते जा रहे हैं कुछ अधूरे पन्ने..
मानो.. घने अंधकार में जा रहे हैं यह रंगते..
इस घनघोर कालिमा के बीच
एक उजास फूटता-सा..
याद आती है वह मुस्कान
जो देखी थी आज चौराहे पर
गुब्बारे बेचती उस लड़की की
मानो कहती हो..
जिंदगी… दुख के सायों में भी
मुस्कुराने का नाम है
जीवन की विसंगतियों को भोगती
वह छोटी-सी बच्ची
जीवन के मूलमंत्र को शायद जानती है
वह मूलमंत्र जिसकी तलाश में
ब्रह्मज्ञानी वर्षों से लगे हैं
वह मुस्कान.. सिखा गई…
हँसकर गमों से लड़ते जीवन पथ पर
डटे रहना ही असली ज़िंदगी है..
असहायता का कलेवर ओढ़
कर्तव्य पथ से भटकना
तो संभवतः बुजदिली है..
मंजिल खोने के खतरे को साथ लेकर जिए
तो यह किताब निरर्थक स्याह हो जाएगी
दूसरों के लिए प्रेरक बनती
एक कहानी अधूरी रह जाएगी
बेशक.. असफल रहूँ
मंजिलों की चकाचौंध पाने में
पर जीवन-रण में
संघर्ष भरी मेरी हर इक हार..
मिसाल बन जाएगी
मिसाल बन जाएगी ||
वर्णिका..


