हाथ की लकीर तो लंबी थी
बस जिंदगी का साथ कम सा था
मौत के आगोश में जाने से पहले
ऐ जिंदगी तेरा रवैया कुछ नम सा था
अनगिनत ख्वाबों का एहसास कुछ क्षण का था
भीगी पलकों में छुपा दर्द हमदर्द सा था
मैं लौटूंगा शायद या नहीं इस पहेली का जवाब कहीं गुम सा था
सो जाऊं शांति को ओढ़ आज
सफेद चादर में मेरी रूह की मौजूदगी का निशां हमदम सा था
( वर्णिका.. )


