गुरु तेरे ऋण की जन्मों जन्म
रहूंगी मैं कर्जदार
जीवन के हर मोड़ पर
खड़ा था तू हाथ में लिए ज्ञान की मशाल..
उर में परोपकार की गंगा बहती
है वाणी में सरस्वती का वास
तुम बिन इस जीवन की गति क्या होती?
शून्य में सिमट जाता मेरा संसार...
मेरी कल्पनाओं में
रंग भरने वाले इन हाथों का
ना भूलूंगी कभी उपकार
तू ही बता.. दूं तुझको
आज मैं क्या उपहार? ...
तम आच्छादित धवल सितारे
भटकते थे ढूंढते सहारे
पर तुम्हारी इस ज्ञान मशाल ने
पथ रोशन कर दिए हमारे..
स्वर्णिम आभामय यह जीवन
प्रशंसनीय सभी ने पाया
पर इस आभा की तपिश का ताप
मात्र तुमने ही अपनाया ...
जीवन एक शिक्षा
शिक्षामय यह जीवन तुम्हारा
शिक्षा ही प्राण
शिक्षा पहचान
शिक्षा ही है पर्याय तुम्हारा...
शिक्षा का यह दर्शन बना
दर्पण तुम्हारे जीवन का
इसमें ही झलक रहा है
विस्तार तुम्हारे जीवन का…
लालसाओं की इस दुनिया से
नाता तेरा रहा नहीं
देकर बदले में लेना
यह तुमने कभी सीखा नहीं..
विद्या का निस्वार्थ दान
तुमने माना शाश्वत है
भौतिकतावाद के क्षणभंगुर मिथ्या सुखों से कहीं बढ़ कर सत्य है...
भले संसार यह माने
तुम्हें व्यावहारिक समझ नही
पर अज्ञान गर्त में डूबा संसार क्या समझे महानता तुम्हारी..
एकलव्य का सर्वस्व जो छीने
ऐसी द्रोण नीयत नहीं तुम्हारी...
ज्ञान के आकाश में टिमटिमाते
असंख्य शिष्य हैं पहचान तुम्हारी
तुमसे अनुप्राणित
हमारी कलम ही है विजय तुम्हारी....
( *वर्णिका* )


