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अलग मज़ा है

महफ़िल के सूने कोने का अलग मज़ा है हँसते जख़्मो को रोने का अलग मज़ा है नज़्मे भी अच्छी लगती पर मेरी मानो ग़ज़लों में ग़म पीरोने का अलग मज़ा है नींदें जाने कैसे आती मुझको लेक़िन बांहो में उनके सोने का अलग मज़ा है स
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