महफ़िल के सूने कोने का अलग मज़ा है
हँसते जख़्मो को रोने का अलग मज़ा है
नज़्मे भी अच्छी लगती पर मेरी मानो
ग़ज़लों में ग़म पीरोने का अलग मज़ा है
नींदें जाने कैसे आती मुझको लेक़िन
बांहो में उनके सोने का अलग मज़ा है
सुनते सुनते बातों में खो ही जाना तुम
बातों बातों में खोने का अलग मज़ा है
पानी को तुम दरिया ख़ातिर छोड़ो यारो
अश्क़ों से आँखे धोने का अलग मज़ा है
उसका होना अच्छा था पर सच कहता हूँ
हाँ अब उसके ना होने का अलग मज़ा है