चलो आज हिज्र की बात करते हैं
तुम आखिर से कहो, हम शुरूआत करते हैं ।
हो गए जुदा बिन बात किये ही
चलो इसी बहाने आज मुलाकात करते हैं।
चाहते तो शायद तुम भी नहीं थे बाद वस्ल के जुदाई
पर ये सब मिलना, बिछड़ना हालात करते हैं।
छोड़ गए हो तुम जो, ग़म कैसा अब
भला कौन यहां जिंदगी भर मसावात करते हैं।
ग़रजने वालों पर क्या यकीं करना 'अज़हर'
बादल तो बिन ग़रजने वाले ही बरसात करते हैं।


