ज़ख्म सह लिया मगर उफ़ तक नहीं किया
खामोश है बस्ती मगर बेज़ुबान नहीं है
और दर्द में कर दें जो बयां अपनी दास्तान
मशरूफ होंगे वो पर परेशान नहीं है
जानों कभी फुर्सत में इनकी गुर्बतों के राज़
भूखा भले हो पेट सही, नीयत शैतान नहीं है
रिश्तों में सौंधी खुशबू, किश्तों में नींद लें
रौनकों में चेहरे, वीरान नहीं हैं.
है भूख माना छोटी, पर वक़्त पे दो रोटी
मेहनत की कसौटी पर आसान नहीं है
कफ़न-ए-पाग होगी, खुनी वो राख होगी
नसीब में लेकिन, उनके ये हिन्दुस्तान नहीं है.