लकड़ी की मेज पर, कुछ अधूरे पन्ने और कुछ बिखरी पुस्तकें, वहीं कोने में पड़ी एक घडी, कुछ आवाज़ें, और कुछ दस्तकें, रुक गई हैं, मेरे दिन की तरह!! ये रोज़ सवेरे उगता है, मीठी अंगड़ाई लेता है इस दिन के सीने में फिर क्यों अरमान दिखाई देता है, उन अरमानों की लड़ी कहीं उन लम्हों की हरकतें, रुक गई हैं मेरे दिन की तरह!! आज से कुछ महीनों पहले, एक कमरे में कुछ तय हुआ था, जब दिन की बैटरी डाउन हुई, तब 10.40 का समय हुआ था, उस रात की भीगी पलकें, और साये में लिपटी सिलवटें, रुक गई हैं मेरे दिन की तरह!!