जीवन की आपाधापी में, है राज़ कई खुल जाने को
काफिर की ख़ामोशी काफ़ी, बस्ती में आग लगाने को
चमगादड़ के चुंगल में, दुनिया ये सारी की सारी
ताक में बैठा है उल्लू होशियारी चट कर जाने को
शुक्र है हमने थाम रखी है सब्र की ऊंची मीनारें
यहाँ बेसब्री के बोझ तले, तैयार हैं सब दब जाने को
लूट-खसोट गद्दारी की नीयत है भरी सब आँखों में
जान खाने को और जुबां मिली सुलगाने को
जाने भी दो यारों कहकर, जाने कैसे दें यारों को
आज़ाद ख्यालों के हम हैं, गुस्ताख़ यहाँ कहलाने को