ज़मीन की आज़माईश में चढ़े शिखर धीरे धीरे मेरे अंदर उतरता है सफर धीरे धीरे चरागों के हवाले कर चले हम गुमनाम उदासियों को अलविदा कह चले तुझको ऐ शहर धीरे धीरे आ जाये नींद सुकून से बर्फ के लिहाफ में छुपकर भुला दे दर्द सारे और दर्द-ए-जिगर धीरे धीरे मुसाफिरात को बख्शी है अदा एहतियात ने मेरी खाना-बदोशियों ने पाया हुनर धीरे धीरे हो जाएं चल आज़ाद झंझटों की गिरफ्त से ढूंढें सुनहरी राह-गुज़र धीरे धीरे