ज़मीन की आज़माईश में
चढ़े शिखर धीरे धीरे
मेरे अंदर उतरता है
सफर धीरे धीरे
चरागों के हवाले कर चले हम
गुमनाम उदासियों को
अलविदा कह चले तुझको
ऐ शहर धीरे धीरे
आ जाये नींद सुकून से
बर्फ के लिहाफ में छुपकर
भुला दे दर्द सारे और
दर्द-ए-जिगर धीरे धीरे
मुसाफिरात को बख्शी है
अदा एहतियात ने
मेरी खाना-बदोशियों ने
पाया हुनर धीरे धीरे
हो जाएं चल आज़ाद
झंझटों की गिरफ्त से
ढूंढें सुनहरी
राह-गुज़र धीरे धीरे