शायद वो उसका अकेलापन

या मजबूरी वासना की थी 

जो उसने मेरे प्यार को अपना लिया 

उस रात जब उसने मुझे 

वहाँ बहलाकर बुला लिया 

मेरे होंठो का कांपना

उसका मेरी आँखो में झांकना

मेरा प्यार बढ़ रहा था 

पूरी हो रही थी उसकी वासना 

धीरे धीरे मैंने अपना मान खो दिया 

उसने मेरे बदन को लहू लुहान कर दिया

नशा जब उसका उतर गया

वासना भी भूझ गयी होगी

देखो जाकर वहाँ 

मेरी देह पड़ी होगी

एक रूह की पुकार है ये 

जिसकी देह वहाँ छलनी पड़ी होगी 

कोई था नही बचाने वाला 

आबरू वहाँ मेरी छिन गयी 

दर्द इतना था अंदर बाहर 

आँखे वहीं पर बिछ गयी