ज़रा थम जा ऐ! ज़िन्दगी


चल चलते है

इस भागते शहर

इस दौड़ती भीड़ से

मीलों दूर

उस जगह की तलाश में

जहां आज भी बहती है कोई नदी

स्वछंद और निर्मल

जहां आज भी सुनाई देते है

पंछियों के गीत

जहां आज भी खिलखिलाती है

वृक्षों की डालियां

जहां आज भी बसती है

 खामोशियां


चल चले


संसार की चिंताओं से परे

जहां हम मित्रता करेंगे

उन खामोशियों से

बातें करेंगे उन वृक्षों से

और घंटो बैठ कर सुनेंगे

उन पंछियों के गीत


अंततः हम नदियों के किनारे 

बैठ कर ढूंढेंगे खुद मे, खुद को


जो खो गया है

इन शहरों की दौड़–भाग

और भीड़ में कहीं