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जान


ना जाने किसकी अधूरी मंजिल का अंजाम हूँ,आसमान में हूँ, मगर ज़मी का गुलाम हूँ।

कभी थक कर मैं भी चैन से सो जाऊँजो कभी ना ढले, क्या मैं वही शाम हूँ।

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