माँ भारती के चरणों में शीश झुकाये गोली खाये,
मानो कहती बाहें फैलाओ गोद में मुझको सुलाओ,
वो शहीद करता अरदास जो देश पर न्योछावर प्राण दिया,
माँ दे दे तू मुझको पनाह तेरा लाल शहीद तेरे दर आया,
फर्श-ओ-अर्श को भी अभिमान होगा आखिरी सांस तक खूब लड़ा,
दुश्मनों की गोलियाँ भी कई बार सोचा फिर लगा और स्वर्ग चला,
कोई आँख उठाये लरकारे तुम्हे ऐसा हम हरगिज़ ना सहेंगे,
खड़े सिमा पर हम जब तक तुझ पर कोई आंच आने ना देंगे,
माँ की ममता गमगीन होगी पर उनको भी होगा ये गुमान,
उनके लाल ने मातृरक्षा को आहुति दिए अपने प्राण,
घर के आँगन में जिस पिता की ऊँगली थामे चलना सीखा,
उसी आँगन से अर्थी मेरी पिता के कंधे पर सवार हो कर चला,
घर के देहरी पर बैठी सजी दुल्हन की आस भी क्या रोई होगी,
तिरंगे के कफ़न में लपेटे जब सुहाग की रथ द्वार पर पहुंची होगी,
मेरा कोई मजहब ना जाती बस हिन्दुस्तानी ही हैं धर्म मेरा,
भारत माँ की अस्मतों का हिफाजत करना ही हैं कर्म मेरा।


