क्या सुनाऊँ अब सुनाने को कुछ भी ना रहा

एक ज़िंदगी का था साथ वो भी अब रूठ गया


वफाये हमारी महज अब तमाशाई बन गयी

किस्सा हमारे हिस्से का अधूरा ही सुना गया


गर्दिशों में पड़े थे उन लम्हों के हम

जिन लम्हों का दोषी मुझे ठहराया गया


वफ़ा की उम्मीदों से ही निभाया था रिश्ता मैंने

उस रिश्तों में बेवफा मुझको ही बनाया गया


आदतन था मेरा उनका परवाह करना

सितमगर से ये कद्र भी सहा ना गया


अतीत के पर्दो को मैंने भी उजागर किया

जब बुझी राखो को फिर से सुलगाया गया