"शिव - सती वियोग"

"शिव सती का वियोग समय निकट आ गया था"

ये मात्र सिर्फ दो शरीरों का वियोग नही था बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे सूर्य से उसका तेज़, हवा से उसका वेग, चांद से उसकी चांदनी, समुद्र से उसकी गहराई, पर्वत से उसकी ऊँचाई, अग्नि से उसकी तपन का वियोग हो रहा था।

शिव अपने हाथों में सती के शरीर को पकड़े हुए थे, वो इस शरीर को छोड़ना नही चाहते थे। सती की हर एक दर्द भरी आह शिव के हृदय में हज़ारों घावों को उत्पन्न करती और उन्हें बार बार उस कटु क्षण का स्मरण कराती जब वो सती की रक्षा नही कर सके, ये बात उनके मन को कचोट रही थी लेकिन समय के चक्र के सामने ईश्वर की शक्ति भी क्षीण हो जाती है, अब शिव के सामने था सिर्फ सती से वियोग का महान दुःख और पीड़ा।


इस दुःख और पीड़ा के गहरे समुद्र में शिव लगातार डूबते जा रहे थे, वो इतनी गहराई में जा चुके थे कि उम्मीद की सूर्य रूपी किरण भी उन तक नही पहुँच पा रही।

सती भी अपना शरीर ज़िंदगी भर शिव के हाथों में ही रखना चाहती थी, सती को वो सारे मधुर क्षण स्मरण हो रहे थे जो उसने शिव के साथ बिताए थे।

उसका हृदय भी शिव के वियोग से रो रहा था, वो शिव में स्वयं को समाहित करना चाहती थी लेकिन ये अब सम्भव नही था, उसका अंतिम समय आ गया था, वो अब सिर्फ शिव की स्मृतियों को अपने अंतर्मन के किसी कोने में हमेशा के लिए बसा लेना चाहती थी।

शिव स्वयं को इसके लिए दोषी मान रहे थे, क्रोध के मारे उनका शरीर वियोग की गहन अग्नि में जल रहा था, इस शरीर को शीतल करने का एकमात्र साधन थी - सती, जो अब धीरे धीरे उनसे दूर हो रही थी, शिव भी सती रूपी शीतलता के साथ जीवन व्यतीत करना चाहते थे लेकिन अब वो शीतलता स्वयं ही अनन्त काल के लिए शीतल हो रही

सती - शिव के वियोग की स्थिति उसी प्रकार हो रही थी जैसे धरती अम्बर का वियोग, चाँद चकोर का वियोग, समुद्र के दो किनारों का वियोग, शरीर से आत्मा का वियोग अर्थात एक दूसरे के बिना उनका अस्तित्व भी नही है फिर भी वो अब इस जन्म में कभी एक नही हो सकते।

आखिर वो घड़ी भी आ गयी जब समय भी अपने महान दुर्भाग्य पर आँसू बहा रहा था,सती का शरीर शिव के हाथों से हमेशा के लिए दूर जा रहा था, शिव की रुदन पीड़ा से ब्रह्मांड भी स्वयं को निस्सहाय महसूस कर रहा था, शिव के वियोग की गहरी दशा के सामने सम्पूर्ण चराचर की शक्ति भी शक्तिहीन हो गयी थी।

सती के बिना शिव मात्र शून्य थे, उस शून्य की वृत्ताकार परिधि में शिव को अब अकेले ही अनन्त सफ़र की दूरी तय करनी थी।

उस अनन्त सफर की कल्पना मात्र से ही शिव का मन सिहर उठता क्योंकि उस सफर में अब सती का साथ नही था।शिव के प्रत्यक्ष होने का प्रमाण सती ही थी, जब प्रमाण ही अप्रत्यक्ष हो गया तो प्रत्यक्ष भी अप्रमाण हो गया।

- आयुष जैन