थका मुसाफिर कड़ी धूप में

घनेरी  छांव  तुम   हो

लौटना चाहूँ हर बार जहाँ

वो  गाँव   तुम   हो


राही हूँ, पर राह भूला हुआ

मेरी  दिशा  तुम  हो

चंद्र-चांदनी से उजियारी

मेरी   निशा  तुम  हो   


मेरे  मन में दबी कहीं

वो  आवाज  तुम  हो

मेरे लिए तो अनंत प्रेम का

आगाज़    तुम    हो