थका मुसाफिर कड़ी धूप में
घनेरी छांव तुम हो
लौटना चाहूँ हर बार जहाँ
वो गाँव तुम हो
राही हूँ, पर राह भूला हुआ
मेरी दिशा तुम हो
चंद्र-चांदनी से उजियारी
मेरी निशा तुम हो
मेरे मन में दबी कहीं
वो आवाज तुम हो
मेरे लिए तो अनंत प्रेम का
आगाज़ तुम हो


थका मुसाफिर कड़ी धूप में
घनेरी छांव तुम हो
लौटना चाहूँ हर बार जहाँ
वो गाँव तुम हो
राही हूँ, पर राह भूला हुआ
मेरी दिशा तुम हो
चंद्र-चांदनी से उजियारी
मेरी निशा तुम हो
मेरे मन में दबी कहीं
वो आवाज तुम हो
मेरे लिए तो अनंत प्रेम का
आगाज़ तुम हो