नाकाम सी लगने लगी जिन्दगी ,
धुंधला पड़ रहा नाम भी ।
ना जाने किस दिशा में भटक गया ,
पूरे डगर में कोई निशान नहीं ।
मिलो - मिलो तय कर गया ,
मंजिल क्या और कहा ये मालूम नहीं ।
एक डोर उम्मीद की थामे चल रहा ,
किस राह में दूसरा छोर वो ढूंढ रहा ।
थका नहीं , हारा नहीं बस कुछ क्षण आराम का है ,
उलझ जरूर गया हूं , मगर अभी मैं खत्म हुआ नहीं ।
चलते - चलते कोई मार्ग मिलेगा , आज नहीं ,
कल नहीं मगर एक निश्चित काल में मिलेगा ।
वो स्थल जो कृमो से पूर्ण रचित होगा ,
वहीं मेरे जीवन दौड़ का उद्देश्य होगा ।


