अकेले ही रोशनी में दिन के ,

कुछ क्षण बीत जाते हैं।

पर संध्या की ओर जाते ही, 

रस्सीया रात की जकड़ने लग जाती है।

दिन में हो जाते हैं थोड़े से जिन्दा , 

मगर भय लगने लगता, रात के आते ही ।

फिर रात ये आती क्यों है?

जब जीवन को ही बना देती अंधा ।


रात ये आती क्यों है?

परेशानी को और तकलीफ देने,

या व्याकुलता को और बेचेन करने।

रात ये आती क्यों है?

भरी आंखों से नींदें चुराने,

या नींदों से दफन यादें उठाने।

रात ये आती क्यों है?

एक घोर अकेलापन महसूस कराने,

या खुद से खुद को दूर लेजाने।

रात ये आती क्यों है?

वहीं पुराने ख्वाब दिखाने ,

या नये ख्वाबों की अर्जी लगवाने।

रात ये आती क्यों है?

झूठी आशाओं को नया बनाने,

या रोज झूठ को फिर दोहराने।

रात ये आती क्यों है?

मृत शरीर में जान फूंकने

या जीवित शरीर के कुछ प्राण लेजाने।

रात ये आती क्यों है?

मन- तन को सूकून पहुंचाने,

या खुले घाव में शूल चुभोने।


रात ये आती क्यों है?

एक भ्रम का जन्मदाता बनने,

या उसी भ्रम से जीवन विचलित कर जाने।

रात ये आती क्यों है?

अब रहा नहीं जो मेरा फिर उसे अपना बनाने,

या अब रहा नहीं जो मेरा उसकी चाह को और बढ़ाने।

रात ये आती क्यों है?

काले रंग को भी बेरंग बनाने,

या दिन के रंग को कालिख लगाने।


क्यों नहीं दिन , रात का सारा हिस्सा ले लेता,

दोबारा लौटने का रात को, मौका ही नहीं देता।

अब तेरा , मेरा बन जाना , कभी मुमकिन नहीं,

सपने जो रात दिखाते, अब उनका भी कोई वजूद नहीं।

इन सभी वेदनाओ की एक ही चाह,

सदा के लिए तू बनजा मेरी, या 

मुझसे मेरी ये रात कहीं दूर ले जा।


बस यही दुआ अब करता दिन से,

लेले तू पूरी रात की भी जगह ।