अब कम खिड़की, दरवाजो का ,

मकान अच्छा लगता है।

जितना ज्यादा रहे बंद ये , 

उतना जिना आसान सा लगता है।

दूर चमचमाते उजालों से, 

ये बंद अंधकार अच्छा लगता है।

रहकर अकेले उस एक रंग में, 

कुछ जिना आसान सा लगता है।


अभी ख्वाब बन गये है, 

सिर्फ दो बंद कमरों के ।

जो साथ निभाने का वादा कर रहे , 

साथ रहकर इनके अच्छा महसूस हो रहा,

अब हमराही जो बने ये , 

जीना आसान सा महसूस हो रहा।


अकेले, एकांत खुद में , 

खोखलापन जरूर है।

मगर उस चमकती भीड़ से, 

जिन्दगी थोड़े शुकुन में महफूज़ है।

डर लगता उस भीड़ से , 

कहीं उसमें अटक न जाऊं,

तकदीर जिसे बनाली अब , 

दूर उससे कहीं हो न जाऊं।


बचने को इस भीड़ से , 

एक एकांत-पन को तलाशता ।

वोही कम खिड़की- दरवाजो के 

मकान की ओर भागता।

यहां उस रंगीन संसार से , 

सब कुछ अच्छा लगता है।

इन बेरंग चारदीवारी में , 

जिना आसान सा लगता है ।


अब कहीं दूर , बहुत दूर 

एक विरान खोज कर रहा ।

हिस्सा एक अतीत का , 

मेरा पिछा कर रहा ।

अनजानो के बीच जो 

कुछ देर ,मैं उलझा रहता।

यें इंतजार करता, मुझे घूरता , 

मेरा हिस्सा मुझे लौटने को अधीर रहता।


जब तक रहता मैं , अपने-आप में नहीं ।

तब तक खुद को संभाल लेता ।

जूही खुद से खुद को मिलने आता ,

पन्ना अतीत का बिखरने लग जाता।

बिखरते ही सब हलचल, कोहराम मचा देते।

समेटना उस वक़्त हर एक पन्ने को

मानो पंख से पहाड़ उठाना प्रतीत सा लगता ।


मगर फिर भी यही सूना, एकांत-पन,

मन, शरीर ,आत्मा को , रास आ रहा।

उस उजाले की भीड़ से अब, 

कोई वास्ता नहीं दूर-दूर तक।

क्योंकि अकेले नामक बिस्तर में ,

अब जीना आसान सा खुद को भा रहा।