शिददत़ो से ये ज़िन्दगी अब ,
उठ- खड़ी होती नहीं।
सेंकड़ों मिन्नतें करके भी,
निखरती नहीं , संवरती नहीं।
शायद कांटों से यारी इसकी ,
बहुत गहरी महसूस पड़ती।
कुछ कलियां खिलाने को इसलिए ,
थोड़ी सी जमीन भी देती नहीं ।
कोशिश हर मुमकिन करता ,
सातों रंग से इसे नहलाने की।
मगर ओढ़ बरसाती, रंग फिकवाती
अपमान कर, हर एक रंग का ,
बेरंग ही रह जाती।
समझाने का कोई प्रयास करें तो,
खुद को ही बुद्धिमान बताती।
और अनुभव का प्रमाण जो पूछे,
उनको अपना यश-किर्ति दिखलाती।
न जाने कितने चादर ओढ़े,
बस इसी हकीकत का लिबास खोले ,
अब जिन्दगी समक्ष आ खड़ी।
फिर भी यथार्थ को अनदेखा करके
श्रृंगार कर सजाके खुद को,
स्वागत हेतु पलकें बिछाए,
बेशर्म उसकी राह में ,
फूलों का ताज लिए खड़ी।
और वजह यही कुछ और नहीं,
जो शिददत़ो से ये ज़िन्दगी अब ,
उठ- खड़ी होती नहीं।


