गुम कर दिया है, खुद को मैने,

ख्वाहिशों के राहों में।

कुछ मेरे थे अपने और ,

कुछ अपनो ने थमा दिया।

इन ख्वाहिशों के बवंडर में मुझको फसा दिया।

अब तलाशु कैसे, कौनसी जगह है छिपा हुआ।

हर राह ख्वाहिशों भरी ,

मुझे अपनी ओर लुभाती,

भागा भागा उस ओर , 

तलाश जो करने जाता ,

हर बार एक नई ख्वाहिश मे,

खुद को गुम कर के आता ।

अब गुम हो गया हूं,

इस तरह इस जंजाल में।

परछाई भी मेरी ,कतरा रही,

मुझको पहचान ने में, 

फिर भी एक आश में, खुद की तलाश में,

हर एक राह खोजता, टटोलता।

शायद इधर ही भटक गया था, 

क्या पता मिल जाए मेरे निशा।

गुम कर दिया है, जो खुद को मैंने कही।

डूंड निकलूंगा खुद को, इन्ही राहों में कभी।