कुछ लोगो को देखा सागर की ओर जाते,

चलते चलते एक किनारे पर मैं भी पहुंच गया।

कुछ परिवार संग थे, कुछ अपने यारो संग ।

कुछ जानवरों संग थे , तो कुछ अपने प्रेम संग ।

मगर मैं था अकेला , अपना ही संग लिए।

नंगे पैर था चल रहा, बैठ गया एक कोने में।


एक आवाज आई कुछ पल में ही , 

मानों मेरा नाम ले रही।

मैं देखा थोड़ा इधर उधर, 

कुछ बूंदे उछल कर पास आ गिरी।

बोली मुझसे कुछ परेशान दिखते हो, 

संसार से कम, खुद से ज्यादा लगते हो।



हमें बताओ , अपनी व्यथा हमें सुनाओ ,

हम सब कुछ नहीं ,कुछ तो समझ जाएंगे।

चुप रहकर यू सहते रहोगे, 

फिर कैसे हम बात कर पाएंगे।



ये कहते ही वो चले गई, 

कुछ साथी मेरे संग छोड़ गई।

उन्हें लगा ही था मैं, अपने हाल सुनाने,

वो तुरंत वापस दौड़के, मेरी गोद में आ बैठ गई।

वो बोली अब सुनाओ अपनी जीवन कहानी,

मैं अब हु यहीं , मुझे कही वापस जाना नही।


भटक गया हूं, हार गया हूं,

कोई दिशा मुझे दिखती नहीं,

जिसमे खुद के निशान बनाऊं,

ऐसी उपजाऊ जमीं मुझे मिलती नहीं।

धोखा खाया, शिखस्त पाई,

कभी फसा ऐसे मंजर मे,... जहां,

कही कुआ, तो कहीं खाई।


ऐसे काटो के सफर में भी, 

मैं अनेकों का सहारा बना।

जब मुझे सहारे की लाठी चाही,

तब सबने तिनके का गट्ठर थामा दिया।

अब बताओ मैं करू क्या??

विश्वास से चलता जीवन, 

वो विश्वास अब करू कहा??

संघर्ष से हैं लक्ष्य मिलता,

राह है बंद, तो संघर्ष करू कहा।

उद्देश्यहीन सा सब कुछ लगता, मृत्यु भी दुत्तकार रही।

अब बताओ यह जीवन का मैं करू क्या?


बूंदे बोली हमे देखो, सागर से हम बिछड़ जाते

उस सूरज के ताप से, उन चट्टानों की मार से।

अगर डर के हम छुपे रहते,उस सागर के आगोष में,

तो जान नही पाते खुद की महत्वता क्या है... इस संसार में।


वो देखो उन लहरों को, इसी सागर से जन्मे हैं।

खुद की प्रतिभा दिखाने , यह मिलो फासला तय करते हैं।

चोट यह भी खाते हैं इन्ही चट्टानों से, 

मगर फिर मिलों दौड़कर लड़ने वापस आ जाते हैं।



ये चट्टान जो इतना ढीठ दिखता है,यह क्या दर्द नही सेहता है।

फिर भी अपनी अडिगता से क्या कभी पीछे हटता है।

हर लहर कितनी भी उफान में हो, सबको धराशाई कर ही देता है।



वो देखो उस रेत को कभी पानी में भीगी रहती, 

तो कभी सूरज मे तपती रहती, 

कभी रात की ठंड झेलती, कभी सपाट पड़ी रहती ।

तो कभी कईओ के पैरों तले रौदी जाती।

फिर भी वो खुद को इखट्टा कर,अपना मनचाहा आकार बुन ही लेती।



इतना सब कुछ सहते रहे , क्या हम अपनी जगह छोड़ चले, 

सह के इतनी पीढ़ा क्या इनसे मुंह मोड़ रहे । नही

वो खुदको वापस समैठ लेते, जिस कर्म के लिए हैं जन्म लिया।

राख होने तक उसी को अपना परम उद्देश्य समझते।

चाहे कितने भूचाल आए या आए कोई तबाही सुनामी,

ये डटे रहते, मंज़र हो कैसा भी,अपने कर्म में टीके रहते।



हम सब तो निर्जीव है, अस्तिव की रचना हमारी, तुम्हारी ही खोज हैं। अब देखो समय के चक्र को, तुम्हारे अस्तिव की खोज में,

हमे जीव की रूपरेखा मिल रही हैं।


चलो अब उठ जाओ, खोजो अपने आपको।

क्या उद्देश्य, कहा लक्ष्य जुट जाओ उस राह को।

मिलेगा ज़रूर बस संघर्ष से साहस अलग नहीं करना,

तुमसे मिलने को आतुर है वो भी,

सिर्फ तुम्हारे इंतज़ार में, वर्षो कही भटक रहा।

विश्वास की चादर ओढ़े रखना,

जीत ज़रूर होगी जीवन में तुम्हारे ।

और जब सफल हो जाओ, भरपूर बन जाओ,

तो मिलने मुझसे इसी जगह पे, वापस तुम आना ज़रूर ।



मेरी मंजिल और ठिकाना तो सदा यही हैं, 

बीरादरी के तुम्हारे, साथ यहां मुझे मिल ही जाते।