धूप, छाँव, दरिया, पहाड़
ना अब वो दोस्त पुराने है
मुझसे "मैं" निकल गया
अब कुछ ख्वाब है जो, तुम्हारे हैं!!
दरवाजे, चोखट, घर, परिवार
ना अब वो दर-ओ- दीवारे है
कभी मेरे कमरे में आकर देखो
वहाँ कुछ खत है जो तुम्हारे है।।
किस्से, कहानिया, नाटक, किरदार
ना अब वो आवाज़ सुनानी है
सारा दिन ऐसे ही गुजर गया
अब एक रात है जो तुम्हारी है।।
शायर
अवि आर माथुर
Avi R Mathur

