मैं वादों से डरता हूँ,
जो किए जाते हैं,
चौराहों और नुक्कड़ों पर,
जोड़कर हाँथों को,
मैं उन वादों से डरता हूँ,
वादे जो किए जाते हैं,
घर-घर जाकर हाथ जोड़कर,
उन वादों से लोग आम,
जीवित हो उठते हैं फिर मरकर,
दिखती है एक राह उनको,
उन वादों से जिनसे मैं डरता हूँ,
मगर वो राह भी हो जाती है,
आँखों से ओझल,
कुछ चंद दिनों बाद,
मैं ऐसे वादों से डरता हूँ।