जब कभी भी खुदकी ख़ोज में निकला ,
तब तब खुद से बिखर कर निकला ,
न मालूम मुझे की मुझसे क्या क्या निकला ,
जितना भी निकला सब राख सा निकला ,
पाया कभी न पूर्ण खुदको ,
मैं अपने भीतर अधूरा सा निकला ,
था गुजरा जब भी जीत की चाह में ,
मैं तब तब खुद से हार कर निकला ,
मिल जाएं तुझमें अगर ‘मैं’ जोशी ,
मान तू खुदको मार कर निकला ,
आवारा बादल सा बरस के खुद पर ,
मैं वो अभागा जो सुखा निकला ,
निकलना अब बंद कर दिया ,
मैं खुदको ढूंढने के ख्याल से निकला ,
जब कभी भी खुदकी ख़ोज में निकला ,
तब तब खुद से बिखर कर निकला ।
– अविनाश जोशी ।


