मैं – पतझड़ अपूर्ण क्यूं रह जाता हैं ?
वो – क्योंकि वो प्रेम का सबसे अमुलय भाग अपने साथ लाता हैं ।
मैं – कोनसा ?
वो – त्याग का ।
मैं – पर त्याग तो फरबरी ने भी किया हैं अपने हिस्से के दिनों को ..
वो – उसने केवल दिन त्यागा हैं किंतु पतझड़ ने , पतझड़ ने तो अपना सब कुछ त्यागा हैं , पतझड़ ने अपने भीतरी भाव के बोल को नग्न करके वसंत को सोपा हैं ।
मैं – तब तो अत्यधिक प्रेम वसंत के हिस्से आया और विरह पतझड़ के ?
वो – हां , पर इस बात पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकती ....
मैं – क्यूं ?
वो – मुझे तो सदेव प्रेम मिला हैं वसंत के भाती
मैं – तो तुमने अपने हिस्से का प्रेम कभी दिया नही उन प्रेमियों को ?
वो – दिया ना , अपने हिस्से का प्रेम मैंने दिया हैं उन्हें , पर ....
मैं – पर सम्पूर्ण हृदय से नहीं दिया यही न ?
वो – क्या कहूं इस पर , मेरी सभी बात व्यर्थ जाएगी !
मैं – फिर भी ?
वो – “ दिन फरवरी ने ज्यों काटे हैं ,
वो प्रेमियों ने गुलाब को बाटें हैं । "
मैं – निशब्द और भाव हीन हो शून्य हो गया
वो – क्या हुआ ?
मैं – शायद समझ आया की पतझड़ का त्याग क्यूं वसंत के हृदय पर अपनी प्रीत छोर जाता हैं ।
– अविनाश जोशी ।

