
लेखक के मन की बात ।
लिखने की चाह नहीं,
जितनी पढ़ने की है फिर भी,
मजबूरन लिखता रहता हूँ,
कभी बच्चों की खातिर,
कभी अपने लिए,
कभी अजनबियों की खातिर,
कभी तुम्हारे लिए ।
मजबूर हूँ,
न पढ़ पाने की खातिर,
लिखने से कुछ राशि ही मिल जाती है,
पढ़कर मात्र दो वक्त की रोटी भी मिलनी दूभर हो जाती है,
तुम भी जानते ही हो पेट की आग सब कुछ लील जाती है।
लिखने क
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