लेखक के मन की बात । लिखने की चाह नहीं, जितनी पढ़ने की है फिर भी, मजबूरन लिखता रहता हूँ, कभी बच्चों की खातिर, कभी अपने लिए, कभी अजनबियों की खातिर, कभी तुम्हारे लिए । मजबूर हूँ, न पढ़ पाने की खातिर, लिखने से कुछ राशि ही मिल जाती है, पढ़कर मात्र दो वक्त की रोटी भी मिलनी दूभर हो जाती है, तुम भी जानते ही हो पेट की आग सब कुछ लील जाती है। लिखने को मैं सबकुछ लिख लेता हूँ, कहानी, कविता, नाटक, उपन्यास सभी विधाएँ मैं गढ़ देता हूँ, करना ही क्या होता है लिखने में, जो कुछ पढ़ा है अब तक उसका चित्रण कर देता हूँ । कभी सामाजिक तो कभी राजनीतिक व्यंग्य कह देता हूँ , कभी किसी पर क्रोध तो कभी स्नेह अभिव्यक्त कर देता हूँ, लिखना है ही कौन सा बड़ा काम आजकल, कभी प्रेमचंद तो कभी मुक्तिबोध की नकल कर लेता हूँ ।