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इक मजबूर का दस्तूर





शीर्षक: एक मजबूर का दस्तूर


बेला है या बला है, कैसा ये दिन चला है

हर रास्ते को देखो जख्मों का सिलसिला है, 

मजदूर हैं मजबूर हैं, घरों से अपने दूर है

पगडंडी को हैं जकड़े,पर पा

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