शीर्षक: एक मजबूर का दस्तूर


बेला है या बला है, कैसा ये दिन चला है

हर रास्ते को देखो जख्मों का सिलसिला है, 

मजदूर हैं मजबूर हैं, घरों से अपने दूर है

पगडंडी को हैं जकड़े,पर पांव थक के चूर हैं

थम ही गये वो रास्ते , जिंदा थे जिनके वास्ते

ये जिंदगी इस मोड़ पे बन के आई बला है, 

कैसा ये दिन चला है, कैसा ये दिन चला है!!!    



by:Avi :@joinavi4ever