बहुत हुआ, यार—

अब तो हिसाब लगाना होगा।

सिर्फ़ खोया है आज तक,

अब तो कुछ पाना होगा।

दिया है बच्चों को

बहुत कुछ,

अब बच्चों को भी लौटना होगा।

दिया था प्यासे को पानी,

अब प्यासे को भी

समंदर छलकाना होगा।

जिनकी रातों को रोशन किया,

जुगनू बनकर—

अगर बन गए वो सूरज,

तो रोशनी उनको भी बिखराना होगा।

डाला था हमने बीज,

आज बन गया है जो वृक्ष,

फैल गई शाखाएँ अनेक—

तो भी उसको फल तो खिलाना होगा।

बहुत हुआ, यार—

अब तो हिसाब लगाना होगा।

— अविनाश