विकास का रास्ता सुना है, मोड़ा जायेगा।

जंगल तो काटे जाएंगे ही,

अब पर्वत को भी तोड़ा जाएगा।


जहां बसती है पशुओं की धड़कन,

पेड़-पौधों की सांस

और जीवन का उत्सव

सुना है, अब अरावली की

नसों को भी काटा जाएगा।


अवशिष्ट पर्वत शिष्टता की मांग कर रहा है ,

क्या प्राचीनता का इतना भी ध्यान नहीं रखा जायेगा?


अविनाश

(राजस्थान, अरावली पर्वत)