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संक्रांति 2026


ज़िंदगी किसी रूढ़ी सी थी,बदलाव की क्रांति हो तुम

ज़िंदगी किसी भ्रांति सी थी,ज़िंदगी के भटकाव की शांति हो तुम।

ज़िंदगी मांझे से लिपटी धागे सी थी,पतंगों-सी उड़ती संक्रांति हो तुम।

— अविनाश
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