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इक हसरते जाना के तलबगार हो गए, उलझे कुछ इस क़दर के गिरफ़्तार हो गए। जादूगरी उन शोख़ निग़ाहों की क्या कहें, हम जान भी न पाए गुनाहगार हो गए। कुछ उनसे थी दरियादिली की फिर भी जुस्तजू, वो झाड़ के पल्लू को ग़म-गुसार हो गए। बस एक नवाजिश तो वो कर ही गये लेकिन,
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