इक हसरते जाना के तलबगार हो गए, उलझे कुछ इस क़दर के गिरफ़्तार हो गए। जादूगरी उन शोख़ निग़ाहों की क्या कहें, हम जान भी न पाए गुनाहगार हो गए। कुछ उनसे थी दरियादिली की फिर भी जुस्तजू, वो झाड़ के पल्लू को ग़म-गुसार हो गए। बस एक नवाजिश तो वो कर ही गये लेकिन, वादा किया न आये इंतज़ार हो गए। ताक़ीद कर गए हैं हर इक रहगुज़र से वो, रोको इन्हें दीवाने बेशुमार हो गए। दिल भर गया तो ठहर के साहिल बने सनम, हम ख़स्तगी की राह में रफ़्तार हो गए। ज़िद अपनी ज़माने से चलो हम भी कह ही दें, वो भी क्या दीवाने जो दर-किनार हो गए?