मैं कल रात बहुत दूर बहुत दूर तक गया, ख़्वाहिश थी बन्दग़ी मगर गुरुर तक गया। उसने भी पलट कर जो किसी सिम नहीं देखा, न अक्स तक गया न शीशा-ए-चूर तक गया। ख़ुद्दारी मेरी इससे ज़ियादा और क्या करे, न हूर तक गया न जी हुजूर तक गया। उसकी तलाश में बहुत भटका किये अब बस, ये इश्क़ की हद थी सनम मगरूर तक गया। जब उससे तग़ाफ़ुल का भी रिश्ता नहीं बचा, वो चाँद तक गया मैं उसके नूर तक गया।