ए दिल तू बार बार बिखर जाता क्यों है?! ज़ख्म और रूह पर पड़ी सिलवटे, ये सब जमाने को दिखलाता क्यों है?! तू अपनेपन का ढोंग रचाकर, एक रकीब की तरह तड़पाता क्यों है?!