अभी तो छोड़ कर जाओगे 

इन यादों के किनारे

जो कश्ती मैंने थामी थी

एक झोके में वो बह गया ।

अब ना तो रहे घर के 

ना तो रहे इस ज़ाहाँ के

शायद ज़िंदगी की उस नदी में

जहाँ उम्मीदों में तैरना मंज़ूर था 

उसी के तरंग के बनाए गए 

एक झोके में वो बह गया 

अब किसी से क्या वास्ता 

ना किसी पर रहे आस्था 

उस मुसकुराहती हस्सी को 

उस नेक यादाश को 

आख़िर कौनसा दुख बताएगा 

की एक झोके में वह बह गया 

फसा रहा वह एक अपनी 

यादों की उस कश्ती में 

स्थिरता से उभर रहा

एक झोके में वह बह गया