हे तारिके! क्या दोष इनका मान लूं मैं?
तू स्वयं ही अंधेरी रात में है जगमगाती,
धैर्य की सीमाएं सभी हैं डगमगाती,
तू तमिस्त्रा में उजाले घोलने का प्रण लिए,
आ खड़ी है चौखटे पर रात की, कुछ क्षण लिए,
तू टिमटिमाती चादर- सी बिछी आकाश के विस्तार पर,
मादकता की वर्षा कर रही संसार पर,
मेघ भी तुझ से लिपटकर डालते हैं आवरण सा,
तू दृग- क्षुधा है तृप्त करती पर मोह तेरा आमरण सा,
तू शीतल सी चंचलता लिए देखती है राह जिसकी,
वो पथिक है दूर का हैं चपल थोड़ी चाह उसकी,
रात थोड़ी बीतने दे,
घन को थोड़ा जीतने दे,
जब शशि से सुशोभित होगा गगन,
तब तू समर्पित कर स्वयं को एकात्म में होगी मगन।


