एक उद्गम से निकलते,
और हर पल साथ चलते,
बाँह थामे हैं शिखर से,
जल बटोरे अंक भर में,
सींचते हर पाट ,
प्रिय! हम नदी के घाट।
फैलता विस्तार पल पल,
वेग से जल बहे कलकल,
दूर करता है निरन्तर,
वक्ष पर प्रिय प्राण धरकर,
करता मिलन की काट,
प्रिय! हम नदी के घाट।
इस छोर से उस छोर तक,
बिलबिलाती भोर तक,
संदेश ले जाती लहर,
रात-दिन आठों प्रहर
जोहती है बाट,
प्रिय! हम नदी के घाट।
एक तट का ले सवेरा,
दूसरे का घुप अंधेरा,
आस पाए कालगति की,
रंगभूमि पर नियति की,
करते विरह का नाट,
प्रिय! हम नदी के घाट।
सकल जीवन पार करके,
धरिणी का उद्धार करके,
व्याकुल हृदय में धीर धर,
हम कभी सागर तीर पर,
सोएंगे बिछा हिय की टाट,
प्रिय! हम नदी के घाट।
