दूर दिगंत तक थी चांदनी फैली हुई,

झिंगुरों के ही स्वरों की रागिनी फैली हुई,

मैं मौन लिए निस्तेज जीवन की वेदना में,

थी निहारती सप्तमी के चांद को संवेदना से,

ना शेष था कुछ भी मेरे भीतर बिखरने के लिए,

ना ऊर्जा ही अब बची थी भाग्य से लड़ने के लिए,

सहसा चन्द्रमा की आभा तनिक धूमिल हुई,

मेघों की एक श्रृंखला विस्तार में शामिल हुई,

मौन गहराता गया और मन डूबा अधिक,

हाय! रुक जाता नहीं ये दूर देशों का पथिक,

पलकें झुकी फ़िर अवनि में गड़ती गई,

जाने क्या क्या मृत्तिका के कणों में पढ़ती गई,

फ़िर चांदनी गाढ़ी हुई और पलकें उठ गई,

और शशि के भाल से मेघ झलकें उठ गई,

मैं शंकित मन से देखती थी निर्निमेश उसको,

क्या मचलाता नहीं यह मेघ का परिवेश उसको,

थोड़ा मुस्काते हुए उसने मुझे उत्तर दिया-

यह मेघ जो आते हैं आतुर, जीवन का मेरे भाग हैं,

हैं ये वही मेरे लिए जो शुद्धता के लिए आग है,

टूटकर फ़िर ध्वस्त हो गया मेरे मन का कलुषित मौन,

स्पष्ट हो गई सारी दुविधा, समझ गई फ़िर मैं हूं कौन,

और हिय का तीक्ष्ण कांटा स्वतः ही निकल गया,

चंद्रमा फ़िर ढल गया,

वक़्त फ़िर निकल गया।