निज़ाम बदलना भी एक फ़िज़ूल कवायद होगी, हुकूमत जिसकी भी हो , पैसे की तवायफ होगी ।   हर हाथ को काम , हर पेट को रोटी देंगे , बशर्ते उनकी तिजोरी में बंद,हमारी बरकत होगी ।   शमशान की आग में भी,वो रोटियाँ सेंक सकते हैं, गौर से देखिये, तबाही की सरपरस्त-सियासत होगी।   उसकी इंकलाबी बातों से,सारा शहर बाबस्ता है, सियासतदान बनने की वो ख्वाईश,कितनी बुलंद होगी।   सुनाता है बेहतरीन कहानी,खुद को वो बताकर फकीर, ज़हन में उसके, गुनाह की कोई हरकत होगी।   बेहया शहर की इमारतें,करती है सवाल हमसे, क्या अब भी किसी आदमी में बसी, इंसानियत होगी ।।