120 रुपए का मेट्रो से आना जाना, अब खलता है, रोज़ साफ किये देता हूँ, घर पर खड़े स्कूटर को, दफ़्तर बस से जाना ही, बन पड़ता है, आफिस की 60 की कॉफी, 40 की चाय जमती नहीं, रेहड़ी की 10 रुपये की, चुस्की से मन, भरता  है, वजन बढ़ ना जाये, ख्याल रखता हूँ, सुबह एक , दोपहर की दो , शाम की फिर एक रोटी, रखती है तरो ताज़ा मुझे, शाम को भूख लगे, तो 10 रुपये, की चाय, सब आसां किये देती है, बचा लेता हूँ वो भी, जो बीवी जेब ख़र्च के लिए देती है, मिलावटी खाने से बचते हुए, मैं बाहर का नहीं खाता, दो जोड़ी कपड़े बहुत हैं, करता नहीं दिखावा, जूते तो सालों साल चलते हैं, आखिर मोची के घर भी तो पलते हैं, जन्मदिन पर दो प्लेट दाल फ्राई, ढाबे से आ जाती है, रोटियां तो घर की ही मन को भाती हैं, महीने के आखिर में फिर, हिसाब किताब कर लेता हूँ, 14 हज़ार की नौकरी में, बच्चों की 2 हज़ार की फीस भर देता हूँ, 4 हज़ार मकान का किराया, 4 हज़ार में घर खर्च चलता है, एक हज़ार और में, बिजली, पानी का बिल निकलता है, हर महीने 3 हज़ार बचाता हूं, बच्चों के कॉलेज के लिए भी , आखिर कुछ जोड़ पाता हूँ, मैं एक मिड्ल क्लास पिता हुँ, बस इतना ही कर पाता हूँ, मैं एक मिड्ल क्लास पिता हुँ, बस इतना ही कर पाता हूँ           .