मैं पीपल का पेड़ हूँ,बीज बिछाए जा रहा हूँ ,

कल की धूप से तुम्हें  बचाने,

मैं पत्थरों में पौधे, उगाये जा रहा हूँ,

जहां मिट्टी,जल ना, माली की,

किसी तवज्जो की गुंजाइश हो,

मैं अपने पैरों पर खड़ा,

भविष्य का रास्ता ,बनाये जा रहा हूँ,

 मोह नहीं नश्वर देह का तनिक भी,

मैं अटल हूँ,

भारत को एक सूत्र में, पिरोये जा रहा हूँ ।।

 

विवेक शर्मा ।।