देशभक्ति के मौसम के, रंग यूँ दिखने लगे,

चौराहे पर गुब्बारों की जगह,अब तिरंगे बिकने लगे,

 

काला मन और रंगी मिज़ाज, है जिनके इख़्तियार में,

झंडा फ़हराते हुए,वो सफेद कपड़ों में मिलने लगे,

 

पूरे दिन की छुट्टी और छत पर उड़ती पतंगों को ही,

बच्चे आजकल के, आज़ादी समझने लगे,

 

मुफलिसी में आज़ादी की ,कीमत खूब बढ़ जाती है,

दो लड्डुओं की खातिर, जब कदम स्कूल की ओर बढ़ने लगे,

 

मैं भी आज़ादी के , मायने बदल रहा हूँ आज,

समझ लूँगा आज़ादी, जब मेरे शहर के गड्ढे भरने लगें ।।

 

विवेक शर्मा ।।