ज़िन्दगी एक नदी सी ही तो है, और क्या है...? तमाम गलेशियरों में रत्ती-रत्ती बर्फ सी पिघलती, इधर से कुछ बूँद उधर से कुछ बूँद हजारो रास्तों से एक में मिलती, छोटे - बड़े कई झरनों से गिरती, पहाड़ सी चुनौतियो को काटती, परेशानी की चट्टानों से टकराती, पत्थर से ज़माने में खुद रास्ता ढूढती, रोडों को तोड़ नए मंजिल बनाती, खुद की तमाम मासूमियत को करोडो ज़िन्दगी में घोल जाती, कुछ अपने किनारे काट नए जीवन जागती, कभी उलझती, कभी उलझाती, कभी हँसती , कभी रुलाती, बचपने में हौसलों से उमड़ती, जवानी में इठलाती, बलखाती, अनगिनत भवंर बनाती, कभी सुलझती, कभी सुलझाती, कभी तेज़, बहुत तेज़ चलती, कभी संगम कराती, ज़माने के तमाम बोझो को , ढोती, भटकती, थकती, हारती, बूढ़ी और शान्त होती, दूर तक पसरी हुई, जीवन के तमाम गाद से भरी, शिथिल, बिना ऊर्जा के, सागर में मिल जाती..! ज़िन्दगी एक नदी सी ही, तो है और क्या है...!