वाह रे ख़ुदा तेरी ख़ुदाई भी अजीब है, तू ग़ुलाब बनाता है काटे निकाल के.! हसीनों के क़ायदे है मुकतलिफ़ आज कल, वो प्यार भी करती है बहुत देख़ भाल के.! पायल की खनक से पूरा शहर जाग उठेंगा, निकला करो तुम रात में बेहद संभाल के.! नज़रो में इश्क की हया को समेट के रखों, देख़ो लाल हैं गाल तुम्हारे बिना गुलाल के.! हमारे चहरे से ये अब जुल्फ़े हटाना नही, मेरा मकाँ खड़ा हो गया है बग़ैर दिवाल के.! आलम बेहद जुदा है उनका कि क्या कहें, फैसले करते है वो बस सिक्के उछाल के.! -अतुल वर्मा