नज़्म- (आख़िरी शव्द)- निगाहों में तुम थी , बाहों में तुम थी जहाँ देखो सिर्फ तुम ही तुम थी, वो दिन कुछ और थे, ये दिन कुछ और है, ना जाने कब, कहाँ किस हाल में मिलोगी , पर भी जब मिलना , वैसी ही मिलना..! हाँ जानते है शक्ले कुछ बेरंग सी हो जाएंगी, और ये तन कुछ ढीला सा, पर रूहें , रूहें कहाँ ढ़लती हैं, उसे यूँ ही लबरेज़ रखना अपनी आबो हवा से, वही तो झोंके है जो हमारी रूह में उतर जाती है, फिर हम होते ही कहाँ है , हम में तो सिर्फ़ आप होती है, इंतज़ार करेंगें आप का वहाँ, जो इस दफ़ा जल्दी रुकसती हो रही है, मिलेंगे आप से किसी दरिया के किनारें, साहिले एक होंगी, और हम भी एक हो के, फिर उँगलियों से पानी में लहरें बनाएंगें, चलते है बेशक मुलाक़ात होगी ज़न्नत में, इल्तिज़ा करेंगें बस यूँही मिलना...! -अतुल वर्मा