कविता:- चुनावी रोटी

नेता उसका गांव से अब दिल्ली चला गया।

दुखिया फिर से उसी मुफ़लसी में रह गया ।।


करोडो खर्चे रैलियों में दलितों के वास्ते।

मैले बदन पे जिसके जर्जर लिबास रह गया ।।


चुनावी रोटी जिस छप्पर में खाकर है आ गये।

कटोरे में उसके वादों का शिगूफा ही रह गया ।।

~अतुल नारायण वर्मा