कल रात वो ख़्वाब फिर आँखों में आया,
चुपके से नींद का दरवाज़ा खटखटा कर,
इंसानियत का वही सवाल फिर से उठाया,
उस ख़्वाब ने मुझे असल नींद से जगाया,
बेटीयाँ वो जिनके दूध के दाँत टूटे नही,
उनके साथ हुई दरिंदगी का मुझे एहसास दिलाया,
रोई होंगी वो भी ज़रूर कोशिश भी की होगी भरपूर,
उस तड़प के बस एक अंश ने मुझे भी रुलाया,
ये है इंसानियत जिसकी धज्जियाँ उड़ीं,
यही तो हैं देवीयाँ जिनकी पूजा हुई,
फिर क्यूँ ज़िन्दगी उनकी यूँ शाप हो गई,
इस सवाल ने अब आईने को भी झूठा बताया,